Wednesday, July 1, 2026

श्रीरंग गोखले 'रंग शिवार्चक'



*सोनेरी पान* : *श्रीरंग गोखले 'रंग शिवार्चक'* 

     (२६ जून १९६३- ०९ नवंबर २०२३)


वरिष्ठ कवि, लेखक, और गीतकार स्व. श्रीरंग गोखले 'रंग शिवार्चक' का जन्म २६ जून १९६३ को कानपुर में हुआ। आपकी बाल्यावस्था प्रयागराज व ग्वालियर में बीती. वर्ष १९८२ में ग्वालियर से यांत्रिकी अभियांत्रिकी में पत्रोपाधि परीक्षा उत्तीर्ण कर आपने इंदौर में मालवा मिल में नौकरी प्रारंभ की. वर्ष १९८९ में रेलवे सेवा में आकर कोटा, राजस्थान में २००३ तक व तत्पश्चात् २०१७ में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति तक जबलपुर में शासकीय सेवा की।आपके पिता श्री रामचंद्र गोपाल गोखले ग्वालियर के प्रमुख साहित्यसेवी और तांबे अभ्यास मंडल के संस्थापक सदस्य रहे थे। पितामह श्री गोपाल वासुदेव गोखले प्रसिद्ध वारकरी कीर्तनकार व भजन लेखक थे। बाल्यकाल से ही परिवार के लेखन, वाचन, समाजकार्य और संगीत के संस्कारों ने हाथ में जो लेखनी पकड़ाई वह संपूर्ण शासकीय सेवा के दौरान सक्रिय रही। 

पूर्णकालिक लेखन करने हेतु 'रंग‌ शिवार्चक' जी ने ६ वर्ष पूर्व स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अनेक लेखन व पुस्तक अनुवाद कार्य किये किंतु दुर्भाग्यवश पूर्णकालिक लेखनकाल ६ वर्षों का ही रहा। आपके कुल ५० वर्ष के रचना संसार में कविता, गीत, ग़ज़ल, आलेख, निबंध, कहानी, नाटक एवं प्रसिद्ध गीतों के गेय अनुवाद सम्मिलित हैं। आपने मराठी के प्रसिद्ध कवि श्री. ग.दि. माडगूळकर द्वारा रचित मराठी रचना 'गीत रामायण' के सभी ५६ गीतों का हिंदी में अनुवाद किया जिसे वर्ष २००५ में पुणे में गदिमा प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित गीत रामायण- सुवर्णमहोत्सव समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी व महाराष्ट्र के गणमान्य साहित्यकारों के सम्मुख प्रस्तुत करने का सौभाग्य मिला। आपने अनेक अन्य हिंदी व मराठी प्रसिद्ध गीतों का भी परस्पर गेय अनुवाद किया है। इस शृंखला को आपने 'अनुनाद' के नाम से आभासीय माध्यम पर प्रकाशित भी किया।

साहित्य के अतिरिक्त कवि 'रंग शिवार्चक' जी ने चिंतन, समाजकार्य, संगीत, विज्ञान, धर्म, वक्तृत्व, सूत्रसंचालन, राजनीतिक समीक्षा, सम्पादन, संस्कृति संरक्षण, पर्यटन, कीर्तन‌, मूर्तिकला व हस्तशिल्प आदि विभिन्न क्षेत्रों में रुचि रखते हुए शासकीय सेवा‌ के साथ-साथ कार्य किया। इस बहुआयामी व्यक्तित्व के कारण उनके लेखन में विषयों और शैली की विविधता दिखती है।

रेलवे के अपने सेवाकाल में राजभाषा प्रभाग हेतु 'रंग शिवार्चक' जी ने अनुकरणीय सहयोग दिया। केंद्रीय कार्यालयों विशेषकर रेलवे जैसे तकनीकी विभागों में हिंदी पत्राचार दुरूह माना जाता है। ऐसे में रेलवे पत्राचार के तकनीकी से तकनीकी विषयों को हिंदी में ही रखने में आपका प्रयास रहा जिसे महाप्रबंधक, पश्चिम मध्य रेलवे द्वारा सम्मानित किया। आपने २००६ में तिरुचिरपल्ली, तमिलनाडु में अखिल भारतीय राजभाषा प्रतियोगिताओं में पश्चिम मध्य रेलवे का प्रतिनिधित्व किया व पुरस्कृत हुए। हिंदी के मानकीकरण के साथ-साथ उसे बोलियों से समृद्ध करने के भी आप पक्षधर रहे हैं। बोलियों के शब्दों का हिंदी कविताओं व लेखन में प्रयोग आपका सदैव प्रयास रहा।

'रंग शिवार्चक' जी ने साहित्य को स्थापित व्यवस्थाओं और मान्यताओं से प्रश्न पूछने का साधन माना। आपके विचार में यदि कोई व्यवस्था स्वयं के पैर पर खड़ी नहीं हो सकती तो उसका भविष्य अंधकारमय है फिर चाहे वह समाज, संस्कृति, धर्म या राजनीति हो। आपके साहित्य में राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक अतिशयोक्तियों पर प्रहार करती हुई अनेक रचनाएँ हैं।

'रंग शिवार्चक' जी का सिद्धांत रहा कि अपने निर्धारित लक्ष्य की सफलता के लिए प्रयास कभी छोड़ना नहीं चाहिए। पत्रोपाधि प्राप्त कर सीधे नौकरी में आने से आपका उच्च शिक्षा का स्वप्न लंबे समय तक पूरा नहीं हो सका। आपने अपने स्नातक के लक्ष्य को पूरा करने हेतु जीवन के अंतिम वर्ष में किडनी की गंभीर बीमारी से जूझते हुए वर्ष २०२३ में नियमित जबलपुर से उज्जैन प्रवास कर अध्ययन पूरा किया व विक्रम विश्वविद्यालय से मराठी विषय में स्नातक की उपाधि प्राप्त की व उसी वर्ष भारतीय शास्त्रीय संगीत की विद् प्रथम परीक्षा उत्तीर्ण की। लगभग ३ वर्षों तक जबलपुर के नर्मदा तट पर स्थित प्राचीन श्री कुशावर्तेश्वर मंदिर की प्रबंध समिति के अध्यक्ष के रूप में नर्मदा परिक्रमावासियों के लिए विश्राम व प्रतिदिन अन्नक्षेत्र का संचालन, सांस्कृतिक व धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जो शारीरिक अस्वस्थता की अवधि में भी अंतिम समय तक जारी रहा।


'रंग शिवार्चक' जी की नाटक लिखने, अनुवाद करने, अभिनय और गायन में गहरी रुचि थी। उनके द्वारा लिखित, अनूदित और अभिनीत हिंदी-मराठी नाटक लगातार तीन वर्ष पश्चिम रेलवे की अंतर्मडलीय नाट्य प्रतियोगिताओं में उदयपुर, रतलाम व मुंबई में पुरस्कृत हुए। आपने अनेक बाल एकांकिकाएँ भी रचीं व कोटा के स्थानीय मंचों पर उनका मंचन हुआ। आपके पुरस्कृत नाटकों में से शिवराम जी द्वारा रचित नाटक 'हे भद्र नागरिक सुनो' का मराठी संस्करण 'ऊठ शहाण्या जाग जरा' प्रमुख है। आपने शास्त्रीय, सुगम व नाट्यगीतों की अनेक मंचीय प्रस्तुतियाँ भी दी। आपका लेखन एक कलाकार की संवेदना से निकलता था। आपकी कविताओं में गहरी समानुभूति व संवेदनशीलता दिखाई देती है।

'रंग शिवार्चक' जी का बचपन बहुत शरारतोंभरा बीता। घर और अगल-बगल के १५-२० बच्चे हरदम कुछ-न-कुछ करते ही रहते। कभी किला बनाना, कभी घरकुल, कभी गुड्डे-गुड़िया की शादी, कभी पुस्तकालय से एक सप्ताह के लिए मिली पुस्तकों को एक-एक दिन में पढ़कर दोस्तों से आपस में बदलना, कभी साथियों पर मजेदार गीत बनाना, नये-नये खिलौने बनाना आदि बचपन में आपके प्रिय काम रहे हैं। कालांतर में भी आपके भीतर का बच्चा सदैव बचपन से जुड़ा रहा। सांस्कृतिक विषय, पुराने खेल व बचपन की कहानियों पर आधारित आपने विपुल बाल साहित्य रचा जिसमें से अधिकांश आपके पोते के जन्म और आपके देहावसान के मध्य के ६ माह में रचा गया।

'रंग शिवार्चक' जी ने अपना जीवन अपनी शर्तों पर व पूरा आनंद लेकर जिया। आप अपने विषय में कहते थे- "कुछ बीज खाने के लिए होते हैं, कुछ बोने के लिए; मैं बोया जाने वाला बीज हूँ"। आपकी निःस्वार्थता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, धार्मिकता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को आपसे परिचित लोग आज भी स्मरण करते हैं। लगभ डेढ़ वर्ष की गंभीर अस्वस्थता के पश्चात् ६० वर्ष की आयु में ९ नवंबर २०२३ को जबलपुर में आपका देहावसान हुआ। आपके अल्प आयु में निधन से साहित्यजगत की बड़ी हानि हुई है। आपका साहित्य, गीत, हिंदी-मराठी भाषाओं के प्रति योगदान‌ व‌ मौलिक चिंतन आज भी आपसे जुड़े हृदयों में जीवित हैं।

मेरी स्मृति में संभवतः प्रथम बार औपचारिक रूप से आपका साहित्य इतने व्यापक क्षेत्र के सूज्ञ पाठकों द्वारा पढ़ा गया है। सभी ने आपके साहित्य को खुले हृदय से परखा, सराहा व अपने भीतर उतारा, इसके लिए मैं सभी के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त करता हूँ। ये उपक्रम मेरे लिए एक प्रस्तुतीकरण से कहीं अधिक बढ़कर था। यह मेरे लिए एक अवसर था आकाश में व्याप्त पिता के शब्दों को फिर से सुन पाने, गुन पाने और सुना पाने का। इस उपक्रम के कारण जैसे मैं आपकी प्रत्यक्ष उपस्थिति अनुभव‌ कर पाया। कई बार तो ऐसा ही लगा कि मानो आप ही इस उपक्रम को संचालित‌ कर रहे हैंं। कविताओं के प्रतिसाद को पढ़कर आप ही आनंदित हो रहे हैं। मुझे ये विलक्षण अवसर उपलब्ध कराने के लिए बड़ी दीदी अलकनन्दा साने  के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। इस उपक्रम में सभी की स्नेहपूर्ण टिप्पणियों व सुझावों को पाकर धन्य हुआ हूँ।


सभी को प्रणाम।


१. कविता क्या है


मैं लिख रहा था,

बेटे का सहज प्रश्न,

पापा! कविता क्या होती है?

कैसे समझाऊँ उसे

कभी छंदबद्ध, कभी अतुकांत पंक्तियाँ

हृदय से झर जाती है अनायास

कविता होती है वह!


सोचा इस बालक को उदाहरणों से समझाऊँ

शायद समझ सके

बेटा, तुम्हारी माँ जो रोटियाँ बना रही है

गोल-गोल, फूली, नरम, हम सबके लिए,

यह भी कविता है!

जो खाने वाले को तृप्ति देती है और पोषण भी


बेटा, जब आकाश में घिर आए हों बादल,

काले, कजरारे, गहन, घुप्प,

और बिजली कौंध जाए अचानक

पल भर को फैले उजियारा और

देर तक गूँजती रहे उसकी गड़गड़ाहट,

ऐसी ही होती है कविता


बेटा, कोई पांच साल का बच्चा,

पहली बार मेले से लौट कर

अपने छोटे भाई-बहन को

बतलाए मेले के बारे में,

मेले की महसूस की हुई रंगीनियाँ

उसके सादे शब्दों में भर दे उजास,

और छोटे बालक की आँखों में छा जाए

चमक, उस अनजान माया लोक की

ऐसी ही तो होती है कविता!


अपनी रौ में मैं कुछ और भी कहता,

पर देखा कि बालक मुझे ताक रहा है,

टुकुर-टुकुर, अपलक, अवाक

कैसे समझाऊँ उसे

कि कविता क्या होती है

लय में गुँथी कुछ पंक्तियाँ

या उनकी आंतरिक ऊर्जस्विता

उसकी अंतर्मुख कर देने वाली प्रवृत्ति

या मन के अंधेरे कोने की उजास


शब्दों से बनती है कविता

पर कविता को कैसे बाँध दूँ शब्दों में,

अमूर्त भाव-बिंबों को कैसे ढाल दूँ एक आकार में,


ये बच्चे न, बड़े अजीब होते हैं

प्रश्न पूछते हैं अपनी समझ से अधिक गहरा

जवाब देने में हो जाती है खुद से मुठभेड़

अपने चारों ओर जमा कर रखी मान्यताओं की किरचें,

कर देती है हमें
लहूलुहान,

चिढ़ जाते हैं हम, बच्चे पर,

ऐसी असहज परिस्थिति पर,

अपने आप पर

और डांट देते हैं उसे अपना बड़प्पन बचाने,

कैसा ऊलजलूल सवाल?


क्या ऐसा ही तो नहीं हो रहा है हमारे साथ

मासूम बच्चों, युवाओं के मौलिक प्रश्न

और सूझ नहीं रहे हैं हमें वे शब्द

जिनमें सारी स्थितियाँ या परिस्थितियाँ

समा जाए एक जवाब की शक्ल में

अंतर्द्वंद्व में हूँ पर विश्वास भी है

कुहासे भरी इस परिस्थिति में

जरूर उठेगी कोई कविता

रोटी की तरह पोषक,

बिजली की तरह चकाचौंध करती,

बालक की आँखों की चमक जैसी,

पर अभी सिर्फ इतना समझ सका हूँ,

मौलिक सवालों के तयशुदा
जवाब नहीं होते


. मास अषाढ के प्रथम दिवस पर 


मास अषाढ के प्रथम दिवस पर 

सहज दिख पड़े तुम यायावर

मेरी प्रिया से कहना जाकर

मेघ तुम्हें प्रार्थना


यक्ष अकेला होकर कातर

शाप भोगता रामगिरि पर

कैसे कहूँ मैं व्यथा विरह की

सहता हूँ यातना 

मेघ तुम्हें प्रार्थना


प्रीति वचन से करता स्वागत

स्वस्थ भाव से सुनना हृद्गत

कुटज पुष्प से स्वीकारो मम

इतनी अभ्यर्थना

मेघ तुम्हें प्रार्थना


सुखासीन भी तुम्हें देखकर

विरहभाव से होते आतुर

मुझ सम विरही व्याकुल की फिर

कैसी हो वेदना

मेघ तुम्हें प्रार्थना


तप्त हृदय के तुम हो आश्रय

इंद्र सचिव हे! हे करुणामय!

अलकापुरी में मेरी प्रिया को

बस इतना कहना

मेघ तुम्हें प्रार्थना 


दूर देश सजनी से मिलना

और संदेशा उसे सुनाना

किसी निवेदन की सज्जन ना 

करते अवहेलना

मेघ तुम्हें प्रार्थना


पहिले मार्ग बता दूँ तुमको

फिर संदेश मेरी सजनी को

बनकर मेरे दूत प्रिया को

धीरज बंधाना

मेघ तुम्हें प्रार्थना


३.कैलिडोस्कोप


चंद मनके और उनकी परछाइयाँ

रच देते हैं अनूठे रूपाकार

बनते बिगड़ते संवरते प्रतिरूप

नए प्रादर्श लगातार

हाथों की हल्की-सी जुंबिश

और सहसा ही बदल जाती है आकृति

नई छवियों का मायाजाल पलक झपकते जागता है

और बहला रहता है देर तक मन

कैलिडोस्कोप खिलौना है अनूठा

सहज रच देता है रंग रेखाओं के संयोजन


बच्चे का विस्मय भाव 

बांधे रखता है उसे इस तिलिस्म से

और समझदार की कल्पनाशीलता जागकर

प्रेरित होती है नए रूपाकार रचने को


चीजें वैसी नहीं होती अक्सर

जैसी महसूस करती है उन्हें दिल की नजर

छवियों और बिंबों की जमावट

बना देती है उन्हें व्यवस्थित और सुंदर


हम जब बच्चे होते हैं

क्षणभंगुरता नहीं डराती हमें

तभी तो कागज की कश्ती को डूबते देखकर भी

बालक भरते हैं किलकारियाँ

बड़े होने को अभिशप्त हैं नियति से

अदन के बाग से निष्कासित हम

हमें भले बुरे का ज्ञान है

दुनिया को कैलिडोस्कोप मानने से इंकार है हमें


४.टिक टिक टिक यह घड़ी कहे


पाँच सौ की हो या पाँच लाख की 

एक-सा ही समय बताती है 

पर मालिक का समय अच्छा है 

कीमती घड़ी अनकहे ही सुनाती है

अनुकूल समय में भला सोचकर 

भला करो, वह काम आयेगा

बंधी रहेगी घड़ी हाथ में

लेकिन समय चला जाएगा


छोड़ बावरे अंधी दौड़

अरे समय से कैसी होड़

समय चक्र चल रहा अनवरत 

कुछ भी कर लो तुम जी तोड़

बेतहाशा दौड़कर भले ही

मानव थक जाएगा 

समय रुका है न रुकेगा 

ये समय भी चला जायेगा


'टिक' 'टिक' 'टिक' यह घड़ी कहे

हम ही टिकना ना जानें

पागल हो कर दौड़ रहे हैं

बिना ठार को पहचाने

नेक विचारों पर जीवन में

अगर कोई जो टिक जाएगा

याद करेंगी उसे पीढ़ियाँ

भले समय चला जाएगा


५. गीत- होली


सजनी से सखी यूँ बोली

सूरज की मिटी न लाली

ना निकली मस्तों की टोली

तू किन संग खेली होली

कह सखी, किन संग खेली होली


आँखों में भरी खुमारी

बिखरी हैं जुल्फें कारी

तेरे गाल हुए सिंदूरी

क्यूँ भीगी है तेरी चोली

कह सखी, किन संग खेली होली


सखी यूँ क्यूँ बात बनाए

और रह-रहकर मुस्काए

वो अब तक लौट न पाए

इस खातिर करे ठिठोली

सुन सखी, किन संग खेली होली


तकूँ राह मैं नींद न आए

थके नैना बोझिल होए

सिंगार भी किसे दिखाए

यूँ बिखरी है जुल्फें काली

सुन सखी, किन संग खेली होली


मेरे जीवन में रंग छाए

उन खातिर माँग सजाए

ये भाव जो मन में छाए

चेहरे पर छब गई रोली

सुन सखी, किन संग खेली होली


फागुन का मस्त महीना

और जाए जुदाई सही ना

उर में जागी ज्वाला से

झर झर झर झरे पसीना

भीगी है सारी चोली

सुन सखी, किन संग खेली होली


मैंने तन मन सब वारे

सखी वे हैं प्राण पियारे

रहे हरदम संग हमारे

मैं पूरी उनकी हो ली

सुन सखी, किन संग खेली होली


सखी मुस्काकर के बोली

तू नार अजब अलबेली

दुख में हँस ताना झेली

जीवन की सजे रंगोली

चल सखी खेलन चलिये होली


६. कवि और पत्रकार


स्थापित मान्यताओं और रूढ़ियों के खिलाफ

खड़े आदमी की नियति

तय कर देती है प्रकृति

किसी मिट्टी के बर्तन की तरह


या तो पत्रकार बनकर पहुँचे

चौकों और चौपालों तक

बैठे घड़े खपड़े या हुक्के की तरह

उनके बीच सहज रूप से

उनकी भूख और सोच से हो वाक़िफ़

उजागर कर दे क्षणभंगुर रूप

और शाश्वत सच जीवन का


या फिर बने कवि जो बरता जाए

अवाम द्वारा ग़म और खुशी के अवसर पर

और सहेज ले प्रकृति उसे

भविष्य के संग्रहालयों के लिए


दोनों के अपने-अपने गर्व हैं

और अपनी-अपनी सीमाएँ भी

पर धरती से जुड़े रहने का

यही तो सुख है।


७. शुद्ध कल्याण की बात


सुर साधने की आओ

एक नयी शुरुआत करें 

राग दरबारी छोड़कर 

शुद्ध कल्याण की बात करें


अलग-अलग सुरों से 

ज़माने में 'सारे गम' बिखरे हैं

इन्हें तरन्नुम में बाँधें 

सरगम की बरसात करें


 बेमानी लफ़्ज़ भी संगीत में

 ढलकर 'तराना' बन जाते हैं

 लफ्जों में नये मायनों की

 यूँ तहकीकात करें


'साध' है मेरी बेवजह की 

'गप' 'धम' से पीछा छूटे

सारे एक 'खयाल' का

आग़ाज़ एक साथ करें


हिंदुस्तानी साजों से

शारदा के दरबार में अलाउद्दीन

ऑर्केस्ट्रा रचे ऐसा जो

फिरंग को मात करे


सुर का खजाना लुटा कर

जो सुरधाम को चली

क्या कहें, जज़्बात लिखने

भरी आँखों को दवात करें


८. कुंडली


जाना जिनको दूर नहीं तूफां से डरते

मौसम तो लहरी है हर पल रंग बदलते

हर पल रंग बदलते मौसम लाख डराए

जीजिविषा मानव की उसको राह दिखाए

नहीं समय अनुकूल कापुरुष गढ़े बहाना

हर मुहूर्त शुभ होता जब ठाना हो जाना


९. क़िता -१


बनेगा काम हर तेरा अगर शुरुआत अच्छी हो

नहीं मंज़िल कोई ऊँची अगर परवाज़ अच्छी हो

खुदा भी नेक बंदों का सदा ही ख्याल रखता है

ज़माना साथ क्यों ना दे अगर जो बात अच्छी हो


१०. क़िता-२


हो हौसला जज़्बात ऐसे ज़िन्दगी की राह मोड़ें

गर इरादों में हो ताकत मुश्किलें खुद राह छोड़ें

ज़माने की बुलंदी पर पहुँचना हो अगर तुमको

तो चुनो अल्फाज़ ऐसे जो दिलों की राह जोड़ें


११. कागज की नाव


कभी हम भी बच्चे थे

और कागज की नावें पोखर में तैराते थे

उनकी आपस में दौड़ कराते थे

साथियों से होड़ लगाते थे

कागज पर कभी तेल, कभी मोम चुपड़ते थे

और भी न जाने क्या-क्या कैसे-कैसे जतन करते थे

पूरे दम-खम से तैराते थे अपनी कश्तियाँ

उन्हें दूर जाते देख खुश होते,

डूबता देखकर भी भरते थे किलकारियाँ


नहीं रहा अब वह दौर

हम बड़े हो गये, और

जीवन में क्षणभंगुरता के साये

हमें डराने लगे हैं

नाव कुछ दूर जायेगी और डूब जाएगी,

कहने में लब थरथराने लगे है


गुम हो गया है बचपन

कागज की नाव की नियति से

सिहर उठता है मन

काँप उठता है मन


१२ . उत्पत्ति स्थिति लय


देख कि महफिल सजी हुई है

श्रोताओं से भरी हुई है

भूल कि बैठा कौन कहाँ है

भूल किसीको क्या दिखता है


जगमग इस संसार को भूल

दुनियावी हर बात फिजूल

रंग देवता को कर वंदन

मौन का होने दे स्वर गुंजन


बस अब यूँ बदलेगा मंजर

इसी जगह पर ठहर पल भर

बाहर थोड़ी निगाह साध

भीतर सारी गठरी बांध


जहाँ से देगा हर कोई ध्यान

पहुँचें वहाँ तुम्हारे कान

सिर्फ तुम्हारा रहा न गीत

भूलो सब जो किया अधीत


कैसा भय है कहाँ उछाह

तुम्हीं शून्य हो तुम्हीं अथाह

यहीं उत्पत्ति स्थिति विस्तार

लय तत्त्व होगा साकार


यही है क्षण जब होंगे विचक्षण

शुरु से पहले अंत का दर्शन


१३. प्यारा गुड्डा


इक प्यारा सा गुड-गुड-गुड्डा

अपने घर में आया है

अपनी भोली मुस्कानों से

उसने मुझे लुभाया है

मैं तुतलाती बोली बोलूँ

दंतहीन हँसी वो भी हँसे

दादा-पोते का रिश्ता वह

बराबरी पे लाया है


१४. जोकर


चलता है वह ठुमक-ठुमककर

सब उसको कहते हैं जोकर

अपना मुँह उसने रंग डाला

हरदम करता गड़बड़झाला


बड़ी-बड़ी आँखें बनवाईं

गोल नाक उसने चिपकाई

कपड़े पहने रंग-बिरंगे

टोपी पर फुंदने भी टांगे


टेढ़ा मुँह बिचकाता है

हँसता और हँसाता है

कई खेल दिखलाता है

पर सच्ची सीख सिखाता है


जो भी हँसकर बात करेगा

सबका प्यारा वही बनेगा


१५ . मुन्ने का ढोलक


मुन्ना बोला माँ सुन लो ना!

मुझे दिला दो‌ इक ढोलक

ढम-ढम ढुम-ढुम ताल‌ पे उसकी

नाचूँगा मैं ठुमक-ठुमक


माँ बोली ना रे ना मुन्ना

जोर से ढोल बजाओगे

सबको तंग करोगे, जब तुम

नाहक शोर मचाओगे


मुन्ना बोला पक्का, माँ मैं

बिलकुल नहीं सताऊँगा

जब सारे सो जाएँगे, मैं

ढोलक तभी बजाऊँगा


१६. सेवानिवृत्ति पर शुभकामना


से वानिवृत्ति एक विराम बिंदु है,

वा स्तविकता के विचार का क्षण।

नि कलना किसी बंधे हुए क्रम से, या

वृ त्त के केंद्र से परिधि पर आगमन

त् यागना अपनी वर्षों की छवि को

ति थि बदलते ही बदल जाना जीवन का

ल गुजरा कचोटता या गुदगुदाता

खी रह गई फाइलों का मसौदा अधलिखा

शु रुआत हर दिन‌ की बेहिसाब आराम के साथ हो, या

र जाए जीवन में विराट रीतापन, सोच पर निर्भर

का म कई परे कर दिए होंगे व्यस्त दैनंदिनी की धुन में

न‌ में सहेजे हुए सपनों को पूरा करने का अवसर

ना म, धन और संबंध कमाया हो, तो उपभोग का समय है

कुछ जी लें, कुछ छोड़ जाएँ, जाना तो तय है।


१७. मंगलमय दीपावली


मं द प्रकाश दीप का सबको देता है संदेश यही

हरा कितना हो तम भी पर हारेगा वह निश्चय ही

ख-लख दीपों की लड़ियों ने फैलाया यूँ उजियारा

ध्यरात्रि में दीपोत्सव ने दूर कर दिया अंधियारा

दि दीपों की मौन वाणी यह दिल को बस छू जाएगी

दीपावली हम सबके जीवन में नित मनती जाएगी



१८. जिंदा है तो जी ले जी भर


जिंदा है तो जी ले जी भर

पलक झपकते बदले मंजर

खाली हाथों चले फकीरा

धरा रहेगा सभी धरा पर


प्यार बाँटकर खुशी लुटाकर

जिंदा है तो जी ले जी भर

मकसद यही बना जीवन का

बने जगत पहले से बेहतर


मौत ही मंजिल पैदा होते

बाकी सब अनजाने रास्ते

जिंदा है तो जी ले जी भर

फिर चलो शान से हँसते-हँसते


चाहे कोई समझे जोकर

जो करना हो करना हँसकर

याद से आए चमक आँख में

जिंदा है तो जी ले जी भर


१९. पैसे के पेड़ के बीज


प्रभु मेरे सपने में आये 

और कुछ बीज थमाये 

कहा ये बीज नहीं ऐसे-वैसे

इन्हें बोएँगे तो जरूर फलेंगे पैसे 

मैं थक गया इन्हें देने की

कोशिश करते-करते

पर कोई भी पूरी नहीं कर पाता इसकी शर्तें  


भले ही पैसे के मारे परेशान रहते हैं

पर शर्त सुनकर हिम्मत नहीं करते हैं 

तुम हो अगर परेशान 

तो सुनो लगाकर ध्यान 

पेड़ को सहेज अगर लोगे 

तो जरूर पैसों से घर भर लोगे 


पहली बात पेड़ बड़े होने में

बरसों लग जाएँगे

आप लगाएँगे तो शायद

नाती-पोते फल पाएँगे


दूसरी शर्त थोड़ी कड़ी है

इसके पालन में जिम्मेदारी बड़ी है

हर पेड़ का बाड़ा अलग,

मालिक अलग होना चाहिए

इन बीजों में किसी 

एक पर ही पैसे लगेंगे

पर सारे साथ रहने पर ही

ये पेड़ फलेंगे


मैंने कहा रहने दें भगवान

क्यूँ करते हैं ऐसा परिहास

मुझे नहीं चाहिए ऐसा कोई पेड़

जिसे सहेजना हो बेआस


आज दो सगे भाइयों की

आपस में नहीं बनती है

फिर पीढ़ियों में सामंजस्य रहेगा

इसकी क्या गिनती है?


शायद मेरे दिये बीज से 

कोई दूसरा हो जाये धनी 

और सब परिवारों की 

आपस में बनी या ना बनी


तब मेरी पीढियाँ उसे 

देख-देख ललचाएँगी

और मेरे बीज के चुनाव पर

मुझे गरियाएँगी  


प्रभु हँसे, बोले ठीक है

सदियों से यही सिलसिला है

इसीलिये पैसों का पेड़ 

आज तक किसी को नहीं मिला है


संकलन --- श्रेयस गोखले



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